Anubhav
Wednesday, August 31, 2011
अब हमें नपना नहीं हैं
यहाँ धधकती आग में मत कूदिये
यह शहर अपना नहीं है
कागजी फूलों की रक्षा के लिए
धूप में तपना नहीं है
सामने जो वृक्ष पर आंते तंगी हैं
सत्य है सपना नहीं है
आजकल हर रोज घटते जा रहे हैं
अब हमें नपना नहीं है .
"चरण"
एक मुट्ठी में सिमट कर रह गया है आसमा
एक मुट्ठी में सिमट कर रह गया है आसमा
अब बेचारे चाँद तारे पैर फैलाएं कहाँ
बिल्डिंगों के मोह में जो फूंक आये झोंपड़े
अब बताओ लौट कर जाएँ तो वे जाएँ कहाँ
बीच में चट्टान है चारों तरफ है खाइयां
रास्ता कोई नहीं अब भाग कर जाएँ कहाँ
कल तलक तो खून का इल्जाम लादे फिर रहे थे
अब बताओ आपने वे वस्त्र धुलवाए कहाँ
हर जलाशय पर बिठा रखे हैं अपने पहरुवे
शर्म लगती है मगर अब डूबने जायें कहाँ .
"चरण"
किस किस को याद कीजिये किस किस को रोईए
आराम बड़ी चीज है मुह ढांक कर सोईये .
"चरण"
लड़कियां कुछ भी लिखती हैं तो बेसुमार कमेंट्स मिलते हैं
आदमी मर के लिखते हैं तो भी चर्चे नहीं होते .
"चरण"
Tuesday, August 30, 2011
दल बदल
दल बदल
आपसे मिलकर के हम फिर से सबल हो जायेंगे
आप घोड़े ही रहो हम अस्तबल हो जायेंगे
आज अपना लो हमें हम आपके आधीन हैं
वर्ना ये दल छोड़कर फिर दल बदल हो जायेंगे
खोटे सिक्के ही सही किन्तु हमें उम्मीद है
आपके प्रताप से हम फिर शायद चल जायेंगे
एक अवसर और दो तो हाथ कुछ दिखलायें हम
आपके सारे विरोधी आग में जल जायेंगे
इसलिए फिर से जमीं पर थूक कर हम चाटते हैं
आपके अहसान से बच्चे मेरे पल जायेंगे .
"चरण"
बिल
एक रात
जब सारी जनता सो रही थी
तब
सेठ फूलचंद
और उनके मुनीम घासीराम के बीच
व्यापार की बातें हो रहीं थीं
मोहन का बिल बन गया
जी हाँ
सोहन का बिल बन गया
जी हाँ
खच्चू का बिल बन गया
जी हाँ
बच्चू का बिल बन गया
जी हाँ
और किस किस का बिल बन गया
जी सबका बिल बन गया
उनके इस मधुर वार्तालाप को
ओट में खड़े कुछ चूहे सुन रहे थे
और अपना सर धुन रहे थे
लो अब मनुष्य के भी बिल बनने लगे
ये भी हमारी ही छाती पर दाल दलने लगे
जब आदमी ही बिल में रहने आयेंगे
तो चूहे बेचारे कहाँ जायेंगे .
"चरण"
मेरे आँगन में इस बरसात में बरसे हैं सांप
डरता हूँ बाहर आते ही डस लेंगे सांप .
"चरण"
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